FerrumFortis
Trade Turbulence Triggers Acerinox’s Unexpected Earnings Engulfment
Friday, July 25, 2025
गांधी की गरिमा & वैश्विक गौरव
भारत सरकार ने महात्मा गांधी की 125वीं जयंती के अवसर पर 1995 में गांधी शांति पुरस्कार की स्थापना की। इसका मूल उद्देश्य सत्य, अहिंसा, सामाजिक न्याय, मानव गरिमा और सेवा की गांधीवादी परंपरा को आधुनिक सार्वजनिक सम्मान का रूप देना था। यह पुरस्कार केवल भारतीय नागरिकों या संस्थाओं तक सीमित नहीं है। इसकी पात्रता राष्ट्रीयता, नस्ल, भाषा, जाति, पंथ या लिंग से परे रखी गई है। यही व्यापकता इसे विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय पहचान देती है। पुरस्कार उन व्यक्तियों या संस्थाओं के योगदान को पहचानता है, जिन्होंने अहिंसक माध्यमों से सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक परिवर्तन को आगे बढ़ाया हो। मानव पीड़ा कम करना, सामाजिक न्याय को मजबूत करना और वंचित वर्गों के बीच सद्भाव बढ़ाना भी इसके प्रमुख आधार हैं। पुरस्कार के तहत ₹1 करोड़ की राशि, प्रशस्ति-पत्र, पट्टिका और पारंपरिक हस्तशिल्प या हथकरघा वस्तु दी जाती है। जरूरत पड़ने पर पुरस्कार दो योग्य व्यक्तियों या संस्थाओं के बीच साझा भी किया जा सकता है। इसकी चयन प्रक्रिया निर्धारित नामांकन नियमों पर आधारित है। सामान्यतः पिछले दस वर्षों के योगदान को देखा जाता है, हालांकि पुराने कार्य को भी बाद में उसकी वास्तविक महत्ता सामने आने पर मान्यता मिल सकती है। यह प्रावधान महत्वपूर्ण है, क्योंकि शांति निर्माण का प्रभाव अक्सर तत्काल दिखाई नहीं देता। शिक्षा, सामाजिक सुधार, मानव सेवा या भेदभाव घटाने वाला कोई अभियान कई वर्षों बाद अपना पूरा प्रभाव दिखा सकता है। इसलिए यह पुरस्कार केवल लोकप्रियता या तात्कालिक चर्चा को महत्व नहीं देता। इसकी असली कसौटी दीर्घकालीन सार्वजनिक हित है। गांधीवादी दृष्टिकोण में शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं थी। इसमें आत्मसम्मान, न्याय, सहयोग, करुणा और कमजोर वर्गों की सुरक्षा भी शामिल थी। यही व्यापक दृष्टि आज भी इस पुरस्कार को प्रासंगिक बनाती है।
शांतिपथ के पुरोधा & प्रतिष्ठित परंपरा
गांधी शांति पुरस्कार के इतिहास में ऐसे व्यक्तियों और संस्थाओं की लंबी सूची मिलती है, जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में मानव कल्याण को आगे बढ़ाया। 1995 में पहला पुरस्कार तंजानिया के पूर्व राष्ट्रपति जूलियस के. न्येरेरे को मिला। इसके बाद श्रीलंका के ए. टी. अरियारत्ने, जर्मन राजनयिक गेरहार्ड फिशर और रामकृष्ण मिशन जैसे नाम सामने आए। 1999 में सामाजिक कार्यकर्ता बाबा आमटे को सम्मानित किया गया। वर्ष 2000 में नेल्सन मंडेला और बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक को संयुक्त रूप से पुरस्कार दिया गया। यह चयन विशेष था, क्योंकि इसमें राजनीतिक मेल-मिलाप और आर्थिक सशक्तीकरण की दो अलग धाराएँ एक साथ दिखाई दीं। 2001 में आयरलैंड के जॉन ह्यूम और 2003 में चेक गणराज्य के पूर्व राष्ट्रपति वाक्लाव हावेल को सम्मान मिला। 2005 में आर्कबिशप डेसमंड टूटू को सम्मानित किया गया। भारत की संस्थाओं में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन को 2014 के लिए पुरस्कार मिला। विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारी को 2015 के लिए सम्मानित किया गया। अक्षय पात्र फाउंडेशन और सुलभ इंटरनेशनल को 2016 के लिए संयुक्त रूप से चुना गया। एकल अभियान ट्रस्ट को 2017 तथा जापान के योहेई सासाकावा को 2018 के लिए सम्मान मिला। ओमान के सुल्तान काबूस बिन सईद को 2019 और बांग्लादेश के शेख मुजीबुर रहमान को 2020 के लिए चुना गया। यह सूची बताती है कि पुरस्कार किसी एक विचारधारा या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। शिक्षा, ग्रामीण विकास, स्वच्छता, स्वास्थ्य, सामाजिक सुधार, कूटनीति, बीमारी उन्मूलन और मानव सेवा, सभी इसके दायरे में आते हैं। इस इतिहास से एक महत्वपूर्ण तथ्य उभरता है। शांति केवल राजनयिक वार्ता से पैदा नहीं होती। कभी स्कूल, भोजन कार्यक्रम, स्वच्छता अभियान, ग्रामीण संस्था या मानवीय सेवा भी शांतिपूर्ण समाज की नींव मजबूत कर सकती है। यही गांधीवादी परंपरा का व्यापक अर्थ है।
अहिंसा की अवधारणा & वैश्विक वैचारिक विस्तार
गांधी की अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा से दूरी नहीं थी। यह आत्मसंयम, नैतिक साहस, सहानुभूति और अन्याय का शांतिपूर्ण प्रतिरोध करने की विचारधारा थी। गांधी ने दिखाया कि सत्ता को चुनौती देने के लिए हमेशा हिंसक संघर्ष आवश्यक नहीं है। जनभागीदारी, सत्याग्रह, नैतिक दबाव और सार्वजनिक चेतना भी परिवर्तन ला सकते हैं। यही कारण है कि उनकी सोच भारत से बाहर भी प्रभावशाली बनी। अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन के नेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने गांधीवादी विचारों से प्रेरणा ली। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद विरोधी संघर्ष के दौरान भी गांधी की अहिंसक परंपरा का व्यापक बौद्धिक प्रभाव दिखाई दिया। गांधी शांति पुरस्कार इसी वैश्विक विरासत का संस्थागत विस्तार है। हालांकि पुरस्कार पाने वाले प्रत्येक व्यक्ति या संस्था से गांधी के तरीकों की हूबहू पुनरावृत्ति अपेक्षित नहीं है। आधुनिक दुनिया की समस्याएँ अलग हैं। आज जलवायु संकट, असमानता, विस्थापन, डिजिटल दुष्प्रचार, स्वास्थ्य आपातकाल, सामाजिक ध्रुवीकरण और आर्थिक असुरक्षा जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं। ऐसे वातावरण में अहिंसा का अर्थ शिक्षा, संवाद, मानवीय सहायता, ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और संस्थागत सुधार भी हो सकता है। यही कारण है कि गांधीवादी शांति को सक्रिय प्रक्रिया के रूप में समझना जरूरी है। किसी समाज में स्थायी शांति संभव नहीं, यदि बड़ी आबादी लगातार गरीबी, अपमान, भेदभाव या अवसरों की कमी झेल रही हो। शिक्षा अवसर बढ़ाकर शांति की आधारशिला बन सकती है। स्वच्छता गरिमा की रक्षा कर सकती है। आर्थिक सशक्तीकरण असुरक्षा घटा सकता है। संवाद समुदायों के बीच अविश्वास कम कर सकता है। इस व्यापक दृष्टिकोण में गांधी शांति पुरस्कार आज भी प्रासंगिक दिखाई देता है। इसकी शक्ति किसी एक ऐतिहासिक घटना में नहीं, बल्कि इस प्रश्न में है कि समाज किन प्रकार के कार्यों को सार्वजनिक सम्मान के योग्य मानता है।
गीता प्रेस & नवीनतम सम्मान की गाथा
सरकार की उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार, गांधी शांति पुरस्कार का नवीनतम घोषित सम्मान गोरखपुर स्थित गीता प्रेस को वर्ष 2021 के लिए मिला। चयन की घोषणा 18 जून 2023 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली जूरी ने की। सरकार ने कहा कि संस्था को अहिंसक तथा अन्य गांधीवादी माध्यमों से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन में योगदान के लिए चुना गया। यह सम्मान गीता प्रेस की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के आसपास आया, क्योंकि संस्था की स्थापना 1923 में हुई थी। सरकारी घोषणा के अनुसार, गीता प्रेस ने 14 भाषाओं में 41.7 करोड़ पुस्तकें प्रकाशित की थीं, जिनमें श्रीमद्भगवद्गीता की 16.21 करोड़ प्रतियाँ शामिल थीं। सरकार ने यह भी बताया कि संस्था अपने प्रकाशनों से राजस्व जुटाने के लिए विज्ञापन पर निर्भर नहीं रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सम्मान को एक सदी के सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान की मान्यता बताया। हालांकि इस चयन को सार्वजनिक क्षेत्र में चर्चा और बहस भी मिली। यह स्वाभाविक है, क्योंकि किसी प्रतिष्ठित शांति पुरस्कार का चयन केवल सम्मानित संस्था के बारे में नहीं होता, बल्कि वह उस समय की सार्वजनिक प्राथमिकताओं का संकेत भी देता है। गीता प्रेस का मामला इस पुरस्कार की व्यापक प्रकृति को भी सामने लाता है। यह सम्मान केवल राजनेताओं या राजनयिकों तक सीमित नहीं है। प्रकाशन, शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियाँ भी सामाजिक प्रभाव पैदा कर सकती हैं। किताबों का प्रसार विचारों, मूल्यों और सांस्कृतिक ज्ञान को पीढ़ियों तक पहुँचाता है। गीता प्रेस को मिला सम्मान इसी प्रकार के दीर्घकालीन सांस्कृतिक प्रभाव की ओर ध्यान खींचता है। इस प्रकरण से यह भी स्पष्ट होता है कि गांधी शांति पुरस्कार में पुरस्कार वर्ष और घोषणा वर्ष अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी भी रिपोर्ट में इन दोनों तारीखों को अलग-अलग देखना आवश्यक है। यही तथ्यात्मक सावधानी सार्वजनिक जानकारी में अनावश्यक भ्रम और obfuscation को रोकती है।
जूरी का निर्णय & सम्मान की संरचना
गांधी शांति पुरस्कार की चयन प्रक्रिया एक औपचारिक संस्थागत ढाँचे के अंतर्गत चलती है। सरकारी जानकारी के अनुसार, जूरी में प्रधानमंत्री अध्यक्ष के रूप में शामिल होते हैं। इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोकसभा में मान्यता प्राप्त विपक्ष के नेता या ऐसी स्थिति में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता तथा नामित प्रतिष्ठित व्यक्ति भी शामिल होते हैं। संरचना नियमों के अनुसार बदल सकती है, लेकिन इसका उद्देश्य स्पष्ट है। पुरस्कार का निर्णय केवल किसी एक विभाग की प्रक्रिया नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें संवैधानिक पदों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों की भागीदारी हो। नामांकन निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आमंत्रित किए जाते हैं। शांति, अहिंसा, सामाजिक न्याय और मानव पीड़ा कम करने वाले कार्यों को चयन में महत्व दिया जाता है। नियमों में मृत व्यक्ति से जुड़े प्रावधान भी हैं। सामान्यतः किसी मृत व्यक्ति के कार्य को बाद में पुरस्कार का आधार नहीं बनाया जाता, लेकिन यदि वैध प्रस्ताव जूरी के पास आने के बाद व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो मरणोपरांत पुरस्कार दिया जा सकता है। ऐसे तकनीकी नियम पहली नजर में साधारण लग सकते हैं, लेकिन बड़े सार्वजनिक सम्मान की विश्वसनीयता के लिए इनका महत्व है। गांधी शांति पुरस्कार का इतिहास यह भी दिखाता है कि हर कैलेंडर वर्ष में अनिवार्य रूप से पुरस्कार नहीं दिया गया। 2004 में पुरस्कार नहीं दिया गया था। 2006 से 2012 तक भी कई वर्षों में पुरस्कार नहीं दिया गया। बाद में कई वर्षों के पुरस्कार एक साथ प्रदान किए गए। 2019 में राष्ट्रपति ने 2015, 2016, 2017 और 2018 के पुरस्कार एक साथ प्रदान किए। इससे एक महत्वपूर्ण पत्रकारिता संबंधी सबक मिलता है। पुरस्कार वर्ष, घोषणा वर्ष और प्रस्तुति वर्ष को एक ही घटना मानना उचित नहीं है। 2021 के पुरस्कार की घोषणा 2023 में होना इसका स्पष्ट उदाहरण है। किसी पुरस्कार की प्रतिष्ठा केवल उसके विजेताओं से नहीं बनती। स्पष्ट नियम, तथ्यात्मक रिकॉर्ड और चयन की विश्वसनीय प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यही संरचना गांधी शांति पुरस्कार को एक दीर्घकालीन सार्वजनिक संस्था के रूप में मजबूती देती है।
मानवीय क्षितिज & शांति का व्यापक अर्थ
गांधी शांति पुरस्कार की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है, शांति की उसकी व्यापक परिभाषा। सामान्यतः शांति को युद्ध, सीमा विवाद और सैन्य संघर्ष की अनुपस्थिति से जोड़ा जाता है। गांधीवादी दृष्टिकोण इससे आगे जाता है। भूख, भेदभाव, बीमारी, अपमान और अत्यधिक गरीबी से घिरा व्यक्ति वास्तविक शांति का अनुभव नहीं कर सकता। पुरस्कार पाने वाली कई संस्थाएँ इसी विचार को मजबूत करती हैं। अक्षय पात्र को स्कूल भोजन और पोषण से जुड़े कार्यों के लिए सम्मान मिला। सुलभ इंटरनेशनल को स्वच्छता और मैला ढोने वाले श्रमिकों की मुक्ति से जुड़े कार्यों के लिए मान्यता मिली। एकल अभियान ट्रस्ट ने ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, सशक्तीकरण तथा सामाजिक समानता के क्षेत्र में काम किया। योहेई सासाकावा ने कुष्ठ रोग उन्मूलन और उससे जुड़े सामाजिक कलंक के खिलाफ काम किया। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि सामाजिक सेवा और शांति निर्माण के बीच गहरा संबंध है। भूख शिक्षा के अवसर सीमित कर सकती है। खराब स्वच्छता स्वास्थ्य और सम्मान दोनों को प्रभावित कर सकती है। बीमारी से जुड़ा कलंक लोगों को समाज से अलग कर सकता है। शिक्षा की कमी गरीबी के चक्र को मजबूत कर सकती है। इसलिए इन समस्याओं का समाधान केवल कल्याणकारी काम नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता में निवेश भी हो सकता है। आज दुनिया पहले से अधिक परस्पर जुड़ी हुई है। संघर्ष केवल हथियारों से नहीं, असमानता, संसाधन संकट, अविश्वास और दुष्प्रचार से भी पैदा हो सकते हैं। इसलिए शांति निर्माण में सरकारों के साथ नागरिक संस्थाओं, शिक्षण संगठनों, स्वास्थ्य समूहों और स्थानीय समुदायों की भूमिका बढ़ती है। गांधी शांति पुरस्कार ऐसे कार्यों को सार्वजनिक पहचान देता है। नेल्सन मंडेला ने मेल-मिलाप की शक्ति दिखाई। डेसमंड टूटू मानवाधिकार और reconciliation से जुड़े वैश्विक प्रतीक बने। वाक्लाव हावेल लोकतांत्रिक परिवर्तन के प्रमुख चेहरे रहे। बाबा आमटे ने सामाजिक सेवा को जीवन का केंद्र बनाया। इन अलग-अलग उदाहरणों से शांति की एक बहुरंगी तस्वीर बनती है।
वैश्विक विरासत & गांधीवादी निरंतरता
हर पीढ़ी गांधी के विचारों को नए सवालों के संदर्भ में देखती है, क्योंकि शांति की चुनौतियाँ लगातार बदलती रहती हैं। गांधी शांति पुरस्कार इसी संवाद को सार्वजनिक मंच देता है। इसके सम्मानित व्यक्तियों और संस्थाओं की सूची में स्वतंत्रता संघर्ष, मानव सेवा, शिक्षा, ग्रामीण विकास, स्वच्छता, स्वास्थ्य, सामाजिक सुधार, कूटनीति और सांस्कृतिक कार्य की अनेक धाराएँ मिलती हैं। पुरस्कार यह भी दिखाता है कि गांधी का प्रभाव केवल स्मारकों या जयंती कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है। अहिंसा, न्याय, गरिमा और सामाजिक जिम्मेदारी आज भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा हैं। हालांकि किसी भी प्रतिष्ठित पुरस्कार की वास्तविक शक्ति इस बात पर निर्भर करती है कि वह किस तरह के कार्यों को सम्मान देता है। इसलिए पारदर्शिता, विश्वसनीय मानदंड और सटीक ऐतिहासिक रिकॉर्ड भविष्य में भी महत्वपूर्ण रहेंगे। पुरस्कार की सूची एक शैक्षिक भूमिका भी निभाती है। विद्यार्थी मंडेला, न्येरेरे, हावेल, टूटू, बाबा आमटे या सासाकावा जैसे नामों से अलग-अलग प्रकार की सार्वजनिक सेवा के बारे में सीख सकते हैं। कोई व्यक्ति राजनीतिक नेतृत्व से बदलाव लाता है। कोई ग्रामीण शिक्षा से। कोई स्वच्छता से। कोई बीमारी के खिलाफ संघर्ष से। कोई सामाजिक मेल-मिलाप से। इस विविधता से यह संदेश मिलता है कि समाज बदलने का कोई एक रास्ता नहीं है। पुरस्कार की अंतरराष्ट्रीय प्रकृति भी महत्वपूर्ण है। इसमें अफ्रीका, यूरोप, एशिया और अन्य क्षेत्रों से जुड़े व्यक्तियों को सम्मान मिला है। इसके साथ भारत की संस्थाओं को भी प्रमुख स्थान मिला है। इस तरह पुरस्कार भारत की गांधीवादी विरासत को वैश्विक संदर्भ से जोड़ता है। भविष्य में इसकी प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करेगी कि नई चुनौतियों को शांति, अहिंसा, न्याय और मानव गरिमा जैसे मूल सिद्धांतों से कितनी सार्थकता से जोड़ा जाता है। तकनीकी बदलाव, पर्यावरणीय दबाव, सामाजिक ध्रुवीकरण और सूचना संकट के युग में ये सिद्धांत अपने आप प्रभावी नहीं होंगे। उन्हें व्यवहार में उतारना होगा। गांधी शांति पुरस्कार इसी निरंतर प्रयास को सार्वजनिक मान्यता देने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है।
OREACO Lens: गांधीय गरिमा & वैश्विक ज्ञानगाथा
गांधी शांति पुरस्कार का इतिहास केवल पुरस्कारों की सूची के रूप में देखने पर अधूरा रह जाता है। सामान्य कथा इसे सम्मान, प्रशस्ति-पत्र और किसी प्रसिद्ध नाम की घोषणा तक सीमित कर सकती है। गहराई से देखने पर यह समाज की प्राथमिकताओं का दर्पण भी है। इसकी यात्रा राजनीतिक नेताओं से आगे बढ़कर शिक्षा, स्वच्छता, ग्रामीण सशक्तीकरण, पोषण, मानव सेवा, बीमारी उन्मूलन, सांस्कृतिक प्रकाशन और सामाजिक सद्भाव तक जाती है। यही व्यापक संदर्भ सूचना की दुनिया में महत्वपूर्ण है। OREACO की 9,999 डोमेन वाली बहुभाषी दृष्टि ऐसे विषयों को अलग-अलग सूचना खाँचों से निकालकर व्यापक संदर्भ में देखने का प्रयास करती है। उसका READ, UNDERSTAND, FILTER, OPINION और FUTURE मॉडल किसी विषय को केवल सूचना नहीं, बल्कि संदर्भ के रूप में समझने पर जोर देता है। गांधी शांति पुरस्कार इसका उपयोगी उदाहरण है। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 2021 के पुरस्कार की घोषणा 2023 में हुई। यदि पुरस्कार वर्ष और घोषणा वर्ष को मिला दिया जाए, तो पाठक को गलत समयरेखा मिल सकती है। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू शांति की परिभाषा है। पुरस्कार का इतिहास बताता है कि शिक्षा, पोषण, स्वच्छता, ग्रामीण विकास और बीमारी के खिलाफ संघर्ष भी शांतिपूर्ण सामाजिक परिवर्तन के साधन हो सकते हैं। ऐसी जानकारी अक्सर सुर्खियों में पीछे छूट जाती है। OREACO का घोषित उद्देश्य जानकारी की अव्यवस्था कम करना और उपयोगी ज्ञान को अधिक सुलभ बनाना है। 66 भाषाओं में इसकी पहुँच का लक्ष्य संभावित रूप से 8 अरब लोगों तक ज्ञान पहुँचाने की परिकल्पना से जुड़ा है। इसी संदर्भ में OREACO स्वयं को मानवता की information climate system के रूप में देखता है, जो वैश्विक सूचना के शोर को अधिक उपयोगी समझ में बदलने का प्रयास करता है। इसका climate crusader दृष्टिकोण केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं, बल्कि सूचना के वातावरण को भी अधिक स्वस्थ बनाने की अवधारणा रखता है। सही स्रोत, संदर्भ, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और तथ्यात्मक स्पष्टता इस सूचना वातावरण की बुनियादी जरूरत हैं। OREACO की दीर्घकालीन महत्वाकांक्षा में Peace Prize के लिए सांस्कृतिक और भाषाई पुल निर्माण तथा Economic Sciences के लिए ज्ञान के लोकतंत्रीकरण जैसी संभावनाओं का विचार शामिल है। इसे वर्तमान पुरस्कार या आधिकारिक नामांकन के रूप में नहीं, बल्कि एक भविष्यवादी संस्थागत आकांक्षा के रूप में समझना चाहिए। अंततः विचार यही है कि जानकारी को केवल जमा करना पर्याप्त नहीं। उसे समझना, परखना और मानव उपयोग के लिए सार्थक बनाना भी आवश्यक है।
Key Takeaways
गांधी शांति पुरस्कार 1995 में भारत सरकार ने शांति, अहिंसा, सामाजिक न्याय और मानव कल्याण के लिए शुरू किया था।
इसके प्रमुख सम्मानितों में नेल्सन मंडेला, डेसमंड टूटू, वाक्लाव हावेल, बाबा आमटे और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन शामिल हैं।
आधिकारिक रूप से उपलब्ध नवीनतम घोषित सम्मान गीता प्रेस को 2021 के लिए मिला, जिसकी घोषणा जून 2023 में हुई थी।
AhimSphere
गांधी की गरिमा & वैश्विक शांति की गाथा
By:
Nishith
Friday, October 9, 2026
Synopsis: भारत का गांधी शांति पुरस्कार शांति, अहिंसा, सामाजिक न्याय और मानव कल्याण के लिए उल्लेखनीय योगदान को सम्मानित करता है। 1995 में शुरू हुआ यह पुरस्कार नेल्सन मंडेला, डेसमंड टूटू सहित कई वैश्विक हस्तियों व संस्थाओं को मिल चुका है, जबकि 2021 के लिए आधिकारिक रूप से घोषित सम्मान गीता प्रेस को मिला।




















